55 साल के भूपेंद्र यादव भाजपा के 12वें अध्यक्ष चुने गए हैं। यादव को भाजपा के राजनीतिक चाणक्यों में गिना जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है कि उन्हें पिछले 12 सालों में पार्टी ने 8 राज्यों में चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी दी। उन्होंने सभी में भाजपा को जीत दिलाई। यही वजह है कि राजस्थान के अलवर से सांसद भूपेंद्र यादव मोदी और शाह की टीम के भरोसेमंद सदस्य हैं। फिलहाल मोदी कैबिनेट में पर्यावरण मंत्री हैं। इससे पहले वे कानून मंत्रालय जैसा अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं। उन्होंने पार्टी के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के लिए आम कार्यकर्ता से लेकर आलाकमान तक का भरोसा जीता और अलग पहचान बनाई। भाजपा ने भूपेंद्र को क्यों चुना गया 3 वजहें 1. भाजपा ने 8 राज्यों में चुनावी जिम्मेदारी दी, सभी में जीत दिलाई : पार्टी ने भूपेंद्र को राजस्थान (2013), झारखंड (2014) में सहप्रभारी और गुजरात (2017), बिहार (2020), मणिपुर (2022), मध्य प्रदेश (2023), महाराष्ट्र (2024) का विधानसभा चुनाव प्रभारी बनाया था। उनकी लीडरशिप में भाजपा को सभी जगह जीत मिली। वहीं, यादव ने 2017 के उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीतने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मोदी-शाह की जोड़ी ने यादव को “मिशन इंपॉसिबल” माने जाने वाले मणिपुर, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में भी जिम्मेदारी दी, जहां उन्होंने संगठनात्मक क्षमता से पार्टी को चुनावी लाभ दिलाया। 2. संघ से जुड़ाव: भूपेंद्र का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ाव बहुत गहरा और पुराने समय से रहा है। वे मात्र सात साल की उम्र से ही संघ की शाखाओं में जाना शुरू कर चुके थे। छात्र जीवन में वे RSS के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े और वर्ष 2000 में ABVP के महासचिव भी बने। इसके बाद वे 2000 से 2009 तक संघ से जुड़े वकीलों के संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) के महासचिव रहे। केंद्र में श्रम मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने संघ समर्थित भारतीय मजदूर संघ (BMS) के साथ मिलकर काम किया और G20 से जुड़ी बैठकों में उनका प्रतिनिधित्व किया। 3. मोदी-शाह के करीबी: भूपेंद्र को पार्टी में मोदी और शाह के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकारों में गिना जाता है। उन्हें अमित शाह का "ऑर्गेनाइजेशन मैन" माना जाता है, जिनके साथ उनका रिश्ता 2010 के दशक की शुरुआत से ही बेहद करीबी रहा है। 2014 में जब शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तब संगठन में बड़े बदलावों और चुनावी रणनीति के संचालन में भूपेंद्र यादव उनकी कोर टीम का हिस्सा थे। उन्हें लगातार बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, यूपी जैसे अहम राज्यों में चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा गया। ऐसा कहा जाता है कि ये नियुक्तियां सीधे शाह की सिफारिश और भरोसे के आधार पर होती थीं। उत्तर-मध्य भारत, ओबीसी-यादव समुदाय को साधने की रणनीति भूपेन्द्र भाजपा अध्यक्ष बनने से पार्टी को खासतौर पर उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में बड़ा राजनीतिक लाभ मिल सकता है। वे यादव और ओबीसी समुदाय से आते हैं, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में निर्णायक भूमिका निभाता है। बिहार में इस साल के आखिर (अक्टूबर, नवंबर) में चुनाव होने हैं। यादव के सामने चुनौतियां, 3 साल में 12 चुनाव भूपेन्द्र के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी है, जहां पार्टी को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के बाद एंटी-इनकम्बेंसी का सामना करना पड़ सकता है। उन्हें गठबंधन की राजनीति में एनडीए के सहयोगी दलों के साथ तालमेल बनाए रखना होगा, खासकर सीट बंटवारे और नीति निर्धारण के समय। बिहार में कुछ महीनों के बाद चुनाव है। इसके अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में भाजपा के कमजोर होते संगठन को फिर से मजबूत बनाना पड़ेगा। सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि प्रधानमंत्री मोदी के बाद पार्टी की विचारधारा और नेतृत्व की दिशा किस ओर जाएगी, इसके लिए उन्हें नया मार्ग तय करना होगा। हरियाणा और राजस्थान में रहा परिवार, परिवार में 2 बेटिंयां भूपेंद्र का पैतृक गांव गुरुग्राम जिले के गांव जमालपुर में है, लेकिन उनके पिता कदम सिंह यादव रेलवे में नौकरी करते थे। लंबे समय तक राजस्थान के अजमेर में तैनात रहे। भूपेंद्र ने सेंट पॉल स्कूल और अजमेर सरकारी कॉलेज से पढ़ाई की। 1993 में उनके पिता सेवानिवृत्त हुए और तब पूरा परिवार जमालपुर आ गया। 45 साल में भाजपा के 14 अध्यक्ष, आडवाणी और राजनाथ दो-दो बार अध्यक्ष बने