भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के मौके पर शुक्रवार को ‘प्रमुख जन गोष्ठी’ आयोजित की गई। इसमें सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हमारे मत-पंथ, संप्रदाय, भाषा और जाति अलग हो सकती है, लेकिन हिंदू पहचान हम सबको जोड़ती है। हमारी संस्कृति एक है, धर्म एक है और हमारे पूर्वज भी समान हैं। डॉ. भागवत ने कहा है कि भाजपा या किसी राजनीतिक दल को देखकर संघ को समझना सबसे बड़ी भूल है। संघ का उद्देश्य सत्ता, टिकट या चुनाव नहीं, बल्कि समाज की गुणवत्ता और चरित्र निर्माण है। संघ न तो राजनीतिक संगठन है और न ही कोई पैरामिलिट्री या सेवा संस्था, बल्कि यह समाज को आत्मनिर्भर और अनुशासित बनाने का आंदोलन है। गोष्ठी में मोहन भागवत ने राजनीति, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, युवाओं की दिशा, पारिवारिक जीवन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की। कार्यक्रम में मंच पर मध्यभारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडेय और भोपाल विभाग के संघचालक सोमकांत उमालकर उपस्थित रहे। टैरिफ और विदेशी निर्भरता पर स्पष्ट स्टैंड अमेरिका के टैरिफ जैसे वैश्विक मुद्दों पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि भारत को स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि किसी विदेशी वस्तु की आवश्यकता पड़े भी, तो वह भारत की शर्तों पर हो। भारत टैरिफ से डरने वाला देश नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की क्षमता रखता है। नई पीढ़ी को भारतीयता से जोड़ने की जरूरत भागवत ने कहा कि जेन-जी और युवाओं को भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। चीन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां की पीढ़ी को बचपन से राष्ट्रीय दृष्टि सिखाई जाती है, जबकि भारत को भी अपनी पीढ़ी को संस्कार और इतिहास से जोड़ना होगा। फैशन, फास्ट फूड और परिवार पर चिंता भागवत ने कहा कि समाज में फैशन और उपभोक्तावाद की अंधी नकल बढ़ रही है। घर में विवेकानंद का चित्र होगा या किसी पॉप स्टार का, यह समाज की दिशा तय करता है। फास्ट फूड की संस्कृति पर भी उन्होंने संयम की सलाह दी और कहा कि परिवार को साथ बैठकर भोजन करने की आदत लौटानी होगी। भोपाल में पेड़ों की कटाई पर चेताया भोपाल में पेड़ों की कटाई के संदर्भ में भागवत ने चेताया कि विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश नहीं होना चाहिए। पानी, पेड़ और पर्यावरण की रक्षा के बिना कोई भी विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक को भी समाज के लिए खतरा बताया। संघ को समझने की जरूरत भागवत ने कहा कि संघ को लेकर समर्थक और विरोधी दोनों ही कई बार गलत नैरेटिव गढ़ते हैं। संघ की असली पहचान समाज निर्माण है और इसी वास्तविक स्वरूप को लोगों तक पहुंचाने के लिए ऐसे संवाद कार्यक्रम किए जा रहे हैं। न पैरामिलिट्री, न समाजसेवी संस्था भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ गणवेश में पथ संचलन करता है, इसका मतलब यह नहीं कि वह पैरामिलिट्री फोर्स है। संघ सेवा कार्य करता है, लेकिन इससे उसे केवल समाजसेवी संगठन मान लेना भी गलत है। संघ को लेकर हितैषियों और विरोधियों ने कई भ्रांतियां फैलाई हैं, जिन्हें दूर करना शताब्दी वर्ष का उद्देश्य है। न प्रतिक्रिया में जन्मा, न किसी से प्रतिस्पर्धा सरसंघचालक ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी के विरोध या प्रतिक्रिया में शुरू नहीं हुआ। संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा भी नहीं है। इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और देश के अनेक महापुरुषों से संवाद के बाद उन्होंने समाज संगठन की आवश्यकता महसूस की। समाज बदलेगा, तभी देश बदलेगा भागवत ने कहा कि स्वतंत्रता स्थायी तभी रह सकती है, जब समाज में ‘स्व’ का बोध हो। देश का भाग्य नेता या नीति नहीं, बल्कि समाज तय करता है। इसलिए डॉ. हेडगेवार ने समाज में एकता और गुणवत्ता लाने के लिए संघ की स्थापना की और वर्षों के प्रयोग के बाद उसकी कार्यपद्धति विकसित हुई। प्रेशर ग्रुप नहीं, सम्पूर्ण समाज का संगठन संघ ने शुरू से तय किया कि वह किसी ‘प्रेशर ग्रुप’ की तरह काम नहीं करेगा। उसका लक्ष्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करना है। समाज में गुण और अनुशासन आएगा तो देश अपने आप सशक्त बनेगा। इसी उद्देश्य से संघ शाखाओं के माध्यम से राष्ट्रीय वातावरण तैयार करता है। संघ केवल स्वयंसेवक बनाता है डॉ. भागवत ने कहा कि संघ का काम स्वयंसेवक निर्माण तक सीमित है। स्वयंसेवक समाज की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं। संघ किसी भी स्वयंसेवक के काम को रिमोट कंट्रोल से संचालित नहीं करता। समाज में सज्जन शक्ति का नेटवर्क जरूरी भागवत ने कहा कि केवल संघ ही समाज सुधार का कार्य कर रहा है, ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। सभी मत-पंथों में सज्जन लोग हैं। जरूरत है कि इन सभी के बीच एक सहयोगी नेटवर्क बने। संघ इसी वातावरण के निर्माण का प्रयास कर रहा है। पंच परिवर्तन का आह्वान समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए सरसंघचालक ने पंच परिवर्तन का आह्वान किया है कि सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध और नागरिक अनुशासन।उन्होंने कहा कि इन पांच बिंदुओं पर समाज को मिलकर काम करना होगा।