देहरादून पुलिस की 5 गलतियां सरकार के लिए बनीं मुसीबत:पूर्व DGP बोले- ये प्रोफेशनल मिसजजमेंट, नोटिस के बाद जागना सिस्टम की आदत

उत्तराखंड की शांत वादियों और 'एजुकेशन हब' कहे जाने वाले देहरादून में हुई एक घटना ने न केवल राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि दो राज्यों (उत्तराखंड और त्रिपुरा) की सरकारों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। त्रिपुरा के छात्र ऐंजल चकमा की हत्या महज एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि पुलिसिया सिस्टम के "रिएक्टिव" (घटना के बाद जागने वाले) रवैये का एक क्लासिक उदाहरण बन गई है। 9 दिसंबर को मारपीट होती है, और 26 दिसंबर को छात्र की मौत हो जाती है। इन 17 दिनों के भीतर पुलिस ने जिस तरह की सुस्ती और संवेदनहीनता दिखाई, उसने एक साधारण झगड़े को 'नस्लीय हिंसा' और 'राष्ट्रीय मुद्दे' में तब्दील कर दिया। इस पूरे प्रकरण में पुलिस की लापरवाही का खामियाजा अब उत्तराखंड सरकार को भुगतना पड़ रहा है। विपक्ष हमलावर है, मानवाधिकार आयोग (NHRC) जवाब तलब कर चुका है, और नॉर्थ-ईस्ट के छात्रों में असुरक्षा की भावना घर कर गई है। नीचे हम इस पूरे मामले का विश्लेषण करेंगे, पुलिस की उन 5 गलतियों को डिकोड करेंगे जिन्होंने सरकार की फजीहत कराई। हमने इस मामले में उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी आलोक बी. लाल से बात की और उनसे समझने का प्रयास किया कि आखिर पुलिस से चूक कहां हुई। वह 17 दिन, जब सिस्टम सोता रहा और गुस्सा उबलता रहा हैरानी की बात यह रही कि जब देहरादून के एक निजी अस्पताल में ऐंजल चकमा जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था, उसी समय त्रिपुरा की सड़कों पर ऐंजल और उसके भाई पर हुए हमले को लेकर प्रोटेस्ट किए जा रहे थे। त्रिपुरा में गुस्सा उबल रहा था, लेकिन दून पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। मामला इतना बढ़ा कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री को सीधे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात करनी पड़ी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार और डीजीपी को नोटिस भेज दिया। यह सरकार के लिए एक बड़ा 'एम्बैरेसमेंट' बन गया, क्योंकि उत्तराखंड खुद को छात्रों के लिए सबसे सुरक्षित राज्य के रूप में प्रोजेक्ट करता रहा है। दून पुलिस की वो 5 गलतियां, जिन्होंने बढ़ाई सरकार की मुश्किल पूर्व डीजीपी बोले- पुलिस गंभीरता नहीं समझ पाई ऐंजल चकमा हत्याकांड में पुलिस की कार्यप्रणाली को समझने के लिए दैनिक भास्कर एप ने उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी आलोक बी. लाल से खास बातचीत की। पूर्व डीजीपी ने माना कि पुलिस मामले की संवेदनशीलता और संभावित परिणामों को भांपने में पूरी तरह विफल रही। उन्होंने इस मामले को पुलिस की 'प्रोफेशनल मिसजजमेंट' करार दिया है। उनका मानना है कि पुलिस न तो चोट की गंभीरता समझ पाई और न ही मामले के नस्लीय पहलू को भांप सकी। एफआईआर में 48 घंटे की देरी: 'तत्काल एक्शन क्यों नहीं?' ऐंजल चकमा मामले में सबसे बड़ा सवाल पुलिस की लेटलतीफी पर है। पुलिस को 10 दिसंबर को शिकायत मिली, लेकिन मुकदमा 12 दिसंबर को दर्ज हुआ। इस पर पूर्व डीजीपी ने साफ कहा कि यह देरी संदेह पैदा करती है। उन्होंने कहा, "जरूरी यह है कि पुलिस को उस समय क्या शिकायत दी गई थी। अगर शिकायत में मारपीट और गंभीर आरोप थे, तो केस उसी समय दर्ज होना चाहिए था। 48 घंटे की देरी निश्चित रूप से सवाल खड़े करती है कि आखिर पुलिस ने तत्काल प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?" चोट का आकलन करने में फेल हुई पुलिस: 'यह प्रोफेशनल मिसजजमेंट है' पुलिस ने शुरुआत में इसे सामान्य मारपीट माना, जबकि ऐंजल की हालत इतनी गंभीर थी कि 17 दिन बाद उसकी मौत हो गई। क्या पुलिस मेडिकल रिपोर्ट या चोट की गंभीरता देखने में फेल रही? इस पर आलोक बी. लाल ने बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा, "यह एक 'प्रोफेशनल मिसजजमेंट जैसा लगता है। अगर कोई मामूली विवाद होता, तो कोई इतनी जोर से नहीं मारता कि जान ही निकल जाए। पुलिस को घायल की चोटों की प्रकृति और आकार देखकर तत्काल गंभीरता का आकलन करना चाहिए था, जो शायद नहीं किया गया।" गिरफ्तारी में सुस्ती: 'अंदाजा नहीं था मामला इतना बढ़ जाएगा' मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी में हुई देरी पर पूर्व डीजीपी ने इसे 'अंदाजे की चूक' बताया। उन्होंने कहा, "पुलिस को उस समय अंदाजा नहीं था कि यह मामला इतना बढ़ जाएगा। दो बातें बाद में साफ हुईं- एक तो चोट इतनी गंभीर थी कि मौत हो गई और दूसरा यह कि पीड़ित नॉर्थ-ईस्ट का था, जिस पर फब्तियां कसी गई थीं। जब ये तथ्य जुड़े और देश ने नोटिस किया, तब पुलिस दबाव में आई।" नस्लीय धाराएं जोड़ने में देरी: 'जांच को कमजोर करने जैसा' 26 दिसंबर को ऐंजल की मौत के बाद ही पुलिस ने केस में जातिसूचक शब्दों की धाराएं जोड़ीं। क्या यह पहले नहीं हो सकता था? इस पर पूर्व डीजीपी ने कहा, "एफआईआर बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। अगर शुरू में ही शिकायत में जातिसूचक शब्दों का जिक्र था, तो पुलिस को पहले ही ये धाराएं जोड़नी चाहिए थीं। इसे बाद के लिए छोड़ना जांच को कमजोर करने जैसा है।" सिस्टम की आदत: 'नोटिस के बाद ही क्यों जागती है पुलिस?' मानवाधिकार आयोग के नोटिस के बाद पुलिस की कार्रवाई में आई तेजी पर पूर्व डीजीपी ने सिस्टम को आइना दिखाया। उन्होंने कहा, "नोटिस के बाद एक्टिव होना सिस्टम की पुरानी आदत है। लेकिन यह मामला गंभीर है। पुलिस को नोटिस का इंतजार किए बिना 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनानी चाहिए थी। यह देश में किसी को स्वीकार नहीं कि जातिवाद या नस्लवाद को बर्दाश्त किया जाए। कार्रवाई इतनी सख्त होनी चाहिए थी कि समाज में कड़ा संदेश जाता।" सबक: 'यह आइडेंटिटी क्राइम है, पुलिस को सेंसटाइज होना पड़ेगा' देहरादून जैसे एजुकेशन हब में देश-विदेश के छात्र आते हैं। ऐसे में पुलिस को सुधार की जरूरत है। पूर्व डीजीपी ने सुझाव दिया कि ट्रेनिंग से ज्यादा पुलिस को 'सेंसटाइज' (संवेदनशील) करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, "हमें मानना पड़ेगा कि हमारे देश में नस्लवाद की भावना मौजूद है। हम वेशभूषा या शक्ल देखकर फब्तियां कसते हैं। यह 'आइडेंटिटी क्राइम' है। भीड़ कई बार किसी को सिर्फ इसलिए मार देती है क्योंकि वह 'अलग' दिखता है। पुलिस को यह समझना होगा।" सरकार के लिए सबक: क्यों भारी पड़ी यह चूक? यह मामला सिर्फ पुलिस तक सीमित नहीं रहा। यह सीधे तौर पर उत्तराखंड सरकार के लिए एक मुसीबत बन गया। अब इस मामले में आगे क्या? अब जब एसआईटी (SIT) गठित हो चुकी है और मानवाधिकार आयोग की नजर बनी हुई है, उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष होगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या भविष्य में पुलिस बिना किसी की मौत का इंतजार किए, पहली शिकायत पर ही इतनी ही गंभीरता दिखाएगी? ---------------------------- ये खबर भी पढ़ें.... भाई को बचाने के लिए भिड़ा था ऐंजल चकमा:दोस्त बोला- देहरादून पुलिस ने शिकायत नहीं लिखी, माइकल को लाने के लिए कहा गया देहरादून की जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले त्रिपुरा के छात्र ऐंजल चकमा की 17 दिन तक अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ने के बाद मौत हो गई। ऐंजल कुछ ही दिनों में हाई पैकेज की नौकरी जॉइन करने वाला था और प्लेसमेंट को लेकर बेहद खुश था। वो पढ़ाई में इतना होशियार था की उसने एक ही दिन में तीन इंटरव्यू पास किए थे। (पढ़ें पूरी खबर) ऐंजल चकमा के परिवार से मिले पूर्व सांसद तरुण विजय:बोले- उत्तराखंड और उत्तरपूर्वांचल एक, विभाजन करने वाले देश के शत्रु उत्तराखंड के पूर्व सांसद तरुण विजय त्रिपुरा में ऐंजल चकमा के परिवार से मिले। इस दौरान उन्होंने परिवार से बातचीत कर मामले में निष्पक्ष जांच और न्याय की बात कही। ऐंजल चकमा त्रिपुरा के माछीमार गांव से पढ़ाई और नौकरी का सपना लिए, देहरादून आया था। हालांकि 9 दिसंबर को देहरादून में ही 6 बदमाशों ने उसे बुरी तरह पीटा, जिससे उसकी मौत हो गई। (पढ़ें पूरी खबर)