भास्कर के साथ राजस्थान के सबसे ऊंचे गांव का सफर:पैदल पार करने पड़ते हैं उबड़-खाबड़ रास्ते, भालू-लेपर्ड के खतरे के बीच 40 परिवार

1722 मीटर ऊंचा गुरुशिखर (सिरोही) अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी है। यहीं बसा है उतरज गांव। सड़क नहीं होने से न कार जाती है न बाइक। पैदल ही जाना पड़ता है, वो भी उबड़-खाबड़ संकरे रास्तों से होकर। भालू और लेपर्ड के अटैक का खतरा भी रहता है। गुरुशिखर से उतरज तक करीब 5 किमी का जोखिम भरा सफर है। इस सफर पर हमारे साथ आप भी चलिए... भास्कर टीम दोपहर 2 बजे गुरुशिखर पहुंची। स्थानीय लोगों से उतरज का रास्ता पूछा। हर कोई वहां जाने के लिए मना कर रहा था। गांव की तरफ जाने वाले पहाड़ी रास्ते के पास इंडियन एयरफोर्स का रडार स्टेशन हैं। यहां बिना अनुमति जाने की मनाही है। हालांकि रडार स्टेशन से पहले ही गांव जाने की पथरीली पगडंडी साइड से ही डायवर्ट होकर नीचे उतर जाती है। हम इसी पगडंडी से अपने सफर पर निकल पड़े। कुछ लोगों ने साथ में माचिस और पटाखे रखने की सलाह दी। हमने ऐसा ही किया। शुरुआत में सफर आसान था, लेकिन धीरे-धीरे मुश्किलें बढ़ने लगीं। 3 किमी सफर में डेढ़ घंटा लगा। आधे घंटे चलने के बाद कुछ कच्चे घर और खेत दिखाई दिए थाेड़ा आगे चले तो एक गुफा में ऊपर-नीचे बनी अलग-अलग 2 कुटिया दिखी। पास ही मंदिर था। जैसे ही कैमरा निकाला, कुटिया में मौजूद शख्स दौड़कर आया और वीडियो बनाने से मना कर दिया। भूतनाथ नाम के शख्स ने खुद को मंदिर का पुजारी बताया। बोला- ये संत चन्दनगिरि का बनाया बद्रीनाथ मंदिर है। उन्होंने ही वीडियो बनाने से मना कर रखा है। वहां थोड़ी देर रुककर हम आगे बढ़ गए। आधे घंटे चलने के बाद चारों ओर जंगल और पहाड़ों से घिरे कुछ कच्चे घर और खेत दिखाई दिए। एक सरकारी स्कूल था। बोर्ड पर लिखा था, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय उतरज, सिरोही। टूरिस्ट सीजन के कारण अधिकतर पुरुष गांव से बाहर थे गांव के अधिकतर घर बंद थे। कुछ महिलाओं से पूछा तो पता चला कि टूरिस्ट सीजन के कारण गांव के ज्यादातर पुरुष माउंट आबू व गुरुशिखर गए हैं। जो महिला-पुरुष यहां हैं, वो खेतों में काम कर रहे हैं। अब तक अंधेरा गहराने लगा था। हालांकि शाम के साढ़े चार ही बजे थे। हमने रात को गांव में ही रुकना तय किया। रतन सिंह नाम के एक बुजुर्ग ने बताया कि वो आगे शेरगांव की तरफ जा रहे हैं। रास्ते में जंगल में केदारनाथ नाम से मंदिर हैं। हम चाहें तो वहां रुक सकते हैं। कंबल-चद्दर मिल जाएगा। पुजारी भी वहीं रुकते हैं। कोई दूसरा विकल्प (ऑप्शन) नहीं था। ऐसे में हम रतन सिंह के साथ शेरगांव के दुर्गम रास्ते की तरफ पैदल चल पड़े। एक किमी चलने के बाद केदारनाथ मंदिर आ गया। चारों तरफ ऊंची-ऊंची पहाड़ियां, जंगल और बीच में मैदान। मैदान के बीचों-बीच साफ पानी का नाला बह रहा था। टिनशेड में रुकने के लिए दरी-कंबल दिए केदारनाथ मंदिर के पुजारी का नाम शैतान सिंह है। उन्होंने टिनशेड में रुकने के लिए दरी और कंबल दे दिए। अब तक अंधेरा हो गया था। हमें यहां छोड़कर रतन सिंह आगे निकल गए। मंदिर पुजारी ने हमें सख्त हिदायत दी- रात में टिनशेड से बाहर नहीं निकलना है। मंदिर के पास हर रात भालू और लेपर्ड आते रहते हैं। पुजारी की दी हुई रोटी-सब्जी खाकर सोने की कोशिश की। हाड़ गलाने वाली सर्दी में महज 2 घंटे नींद आ पाई। सुबह 7 बजे रोशनी होते ही मंदिर पुजारी को धन्यवाद कर भास्कर टीम वापस उतरज गांव की तरफ निकल पड़ी। जंगल के कारण सड़क और दूसरे कार्यों के लिए NOC नहीं गांव पहुंचे तो कालूराम गेहूं की फसल को पानी दे रहा था। कालूराम ने बताया- खेती से कमाई नहीं होती। बस अपना और मवेशियों का पेट भर लेते हैं। न रोजगार है, न कमाई का कोई और जरिया। सड़क नहीं होने से सब कुछ ठप है। जंगल है तो सड़क और दूसरे कार्यों के लिए कोई भी एनओसी नहीं देता है। सिंचाई के लिए पहाड़ों से आने वाले नालों से पाइप के जरिए पानी खेत पर पहुंचाते हैं। इसमें किसी भी तरह की बिजली और मोटर का काम नहीं हैं। हालांकि गांव में कुछ ऊंचे खेत हैं, वहां डीजल वाले पंप से पानी सप्लाई होती है। जंगली जानवरों से खतरे के बारे में पूछने पर बोले- सुबह ही मंदिर की तरफ एक भालू आया था। गांव में अब मात्र 40 परिवार रहते हैं कालूराम ने बताया- कभी गांव में 150 परिवार थे। अब सिर्फ 40 परिवार हैं, बाकी पलायन कर गए। उनके घर भी खंडहर में बदल गए हैं। आठवीं तक सरकारी स्कूल है। वैसे जिसके पास भी थोड़ा पैसा है, वह अपने बच्चे को माउंट आबू में पढ़ाता है। बाहर पढ़ने वाले बच्चे इसी रास्ते से हर दिन गुरुशिखर और आगे ओरैया गांव तक पैदल ही पढ़ने जाते हैं। मोबाइल में सिर्फ कुछ ऊंची जगहों पर पहाड़ियों में ही बीएसएनएल का नेटवर्क कभी-कभी आता है। राशन का सामान भी गुरुशिखर से ही लाते हैं। सीमेंट, सरिया और बजरी लाना संभव नहीं है। यही वजह है कि सभी घर मिट्‌टी और पत्थर से बने हैं। भालू और लेपर्ड गाय-भैंस पर अटैक कर देते हैं थोड़ा आगे बढ़े तो खेत में काम करते केसरसिंह मिले। केसरसिंह ने बताया कई बार भालू और लेपर्ड गाय-भैंस पर अटैक कर देते हैं। उन्हें बचाने के लिए पहाड़ों में बनी इन गुफाओं को ही उनका शेल्टर बना दिया है। दिन ढलते ही मवेशियों को इन गुफा में डालकर बाहर से बंद कर देते हैं। जंगली जानवरों के साथ ही सर्दी-बारिश से भी बचाव हो जाता है। रात में अक्सर बिजली नहीं होती। थोड़ा आगे चले तो एक युवक मिला। उसने अपना नाम सुरेश सिंह बताया। सुरेश ने बताया कि वो माउंट आबू में रहकर 12वीं कर रहा है। सर्दी की छुटि्टयों में गांव आया हुआ है। अब तक गांव में एक या दो लोग ही होंगे, जिनकी सरकारी नौकरी लगी है। इसके अलावा कोई कुछ नहीं बन पाया। 8वीं के बाद अधिकतर बेटियों की पढ़ाई छूट जाती है यहीं पास में हीरी बाई बैठी थीं, जो बच्चे को गाेद में खिला रही थीं। बोलीं- मेरा पीहर माउंट आबू में है। शादी के बाद पहली बार आई तो चारों तरफ पहाड़ और जंगल देख डर गई थी। मेरी शादी आटा-साटा प्रथा से हुई थी। अब यहां की आदत पड़ गई है। अच्छा भी लगता है कि सुकून की जिंदगी है। लड़कियों को 8वीं तक यहीं पढ़ाते हैं। इसके बाद या तो ओपन से पढ़ाते हैं या पढ़ाई छुड़वा देते हैं। मेरी बेटी का भी ओपन से ही फॉर्म भरा है। जंगली जानवरों के बारे में पूछने पर बोलीं- जब ढाणी में जाते हैं तो भालू और लेपर्ड पास से ही निकल जाते हैं। कभी परेशान नहीं करते। थोड़ा आगे बढ़े तो उतरज गांव की लक्ष्मी कंवर मिलीं। माउंट में उनका पीहर है। बीए, बीएड कर चुकीं लक्ष्मी उतरज में ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। उनकी शादी को 10 साल हो गए हैं। बोलीं- पति बारात के साथ पैदल ही लाए थे। उस समय तो बिल्कुछ अच्छा नहीं लगा, लेकिन अब सब बढ़िया लगने लगा है। पानी तो माउंट से भी बढ़िया है। वहां जाती भी हूं, तो पानी यहां से साथ ही लेकर जाती हूं। एक हफ्ते का राशन और सब्जियां मार्केट से लेकर आते हैं। ज्यादातर कढ़ी ही बनाते हैं। इसके अलावा खेतों में होने वाली सब्जियां काम में लेते हैं। बाहर के लोगों ने गांव में जमीन खरीदी लक्ष्मी ने बताया कि उनके पति शंकर सिंह माउंट में आर्टिफिशियल ज्वेलरी की दुकान चलाते हैं। लक्ष्मी खुद भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं। लक्ष्मी ने बताया कि यहां कुछ बाहर के लोगों ने भी जमीनें खरीदी हैं। हालांकि वो जमीनें ऐसे ही पड़ी हैं। लक्ष्मी से हुई बातचीत और गांव में काफी देर घूमने के बाद फिर से शाम होने लगी थी। ऐसे में हमने फिर से गुरुशिखर की तरफ लौटने का निर्णय कर लिया। शाम में 6 बजे तक गुरुशिखर पर पहुंच गए। यहीं पर हमारी ये रोमांचक पैदल यात्रा समाप्त हो गई। --- माउंट आबू के उतरज गांव की यह खबर भी पढ़िए... राजस्थान के सबसे ऊंचे गांव में पहली बार पहुंचा ट्रैक्टर, 50 लोग बांस के फ्रेम पर 1000 किलो के पाट्‌र्स ले गए; पहाड़ी रास्तों पर 3KM चले राजस्थान के सबसे ऊंची पर्वत चोटी से तीन किमी दूरी पर बसे गांव उतरज में भी अब ट्रैक्टर से खेती हो सकेगी। गांव के ही 60 परिवारों ने मिलकर यह ट्रैक्टर खरीदा है। राजस्थान के सबसे ऊंचे गांव (उतरज) में पहली बार दो हफ्ते पहले ट्रैक्टर पहुंचा है। सिरोही जिले के माउंट आबू के इस गांव में जाने के लिए कोई सड़क नहीं है। पढ़ें पूरी खबर...