इंदौर जहरीला पानी-मुफ्त इलाज के नाम पर मिला केवल बेड:उल्टी-दस्त के शिकार बुजुर्ग की किडनी फेल; बेटा बोला- हमें मुआवजा नहीं, बस हमारे पापा चाहिए

इंदौर के भागीरथपुरा की गलियों में मातम और बेबसी का सन्नाटा पसरा है। यहां कुछ हफ्ते पहले तक जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी, लेकिन नगर निगम की लापरवाही ने सब कुछ बदल दिया। दूषित पानी ने न केवल 16 जिंदगियां छीन लीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों को ऐसा दर्द दिया है, जिसकी भरपाई शायद कभी न हो सके। यह कहानी सिर्फ मौत के आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन लोगों की भी है जो बच तो गए, लेकिन अब एक जिंदा लाश की तरह अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं। इसी त्रासदी के शिकार 62 साल के आकाश मौर्य की कहानी भी ऐसी ही है। आकाश इस समय इंदौर के एमवाय अस्पताल में भर्ती है। उसकी जिंदगी मशीनों के सहारे चल रही है क्योंकि उनकी किडनी फेल हो गई और वह डायलिसिस पर है। परिवार का आरोप है कि यह सिर्फ दूषित पानी का असर नहीं, बल्कि सरकारी अस्पताल के सिस्टम की घोर लापरवाही का नतीजा है, जिसने एक स्वस्थ इंसान को मौत के मुहाने पर पहुंचा दिया है। सात दिनों में उल्टी-दस्त से डायलिसिस तक आकाश मौर्य के बेटे अमित की आंखों में आंसू और आवाज में गुस्सा साफ झलकता है। वह उस भयावह हफ्ते को याद करते हुए कहते हैं, "पापा पूरी तरह ठीक थे। सुबह 5 बजे उठते और 7 बजे काम पर निकल जाते थे। उन्हें कभी कोई बड़ी बीमारी नहीं हुई। पिछले रविवार को उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत हुई, जो उस समय पूरे मोहल्ले में आम थी। हम उन्हें लेकर एमवाय अस्पताल आए, यह सोचकर कि सरकारी अस्पताल है, इलाज अच्छा होगा।" अस्पताल पहुंचते ही परिवार का सामना एक ऐसी व्यवस्था से हुआ, जो उनकी समझ से परे थी। अमित बताते हैं, "डॉक्टरों ने पापा को देखते ही कहा कि इन्हें हार्ट की प्रॉब्लम है। हम चौंक गए। हमने उन्हें साफ-साफ बताया कि पापा को दिल की कोई बीमारी कभी नहीं रही, लेकिन हमारी बात किसी ने नहीं सुनी। 7 दिन में किडनी फेल कैसे हुईं? परिवार का सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यही है कि जो मरीज सिर्फ उल्टी-दस्त के इलाज के लिए भर्ती हुआ, वह सात दिन के अंदर डायलिसिस तक कैसे पहुंच गया? अमित कहते हैं, "हमें इतना डरा दिया गया कि हम कुछ समझ ही नहीं पाए। डॉक्टर कहते थे कि हालत बहुत गंभीर है, किडनी ने काम करना बंद कर दिया है। आज स्थिति यह है कि जो बीमारियां पापा को कभी थीं ही नहीं, वे सब अस्पताल के कागजों में दर्ज हैं और हमारे पापा जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।" ​​मुफ्त के इलाज का खोखला दावा भागीरथपुरा की घटना सामने आते ही सरकार, प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने बड़े-बड़े दावे किए। मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय विधायक तक ने ऐलान किया कि सभी पीड़ितों का इलाज पूरी तरह मुफ्त होगा। लेकिन मौर्य परिवार की आपबीती इन दावों की पोल खोलती है। अमित कहते हैं, "कैलाश विजयवर्गीय जी ने भी कहा, सीएम साहब ने भी कहा कि इलाज का एक पैसा नहीं लगेगा। लेकिन हकीकत यह है कि हमें यहां सिर्फ एक बेड मिला है और डॉक्टर दिन में एक बार आकर देख लेते हैं। हर छोटी-बड़ी जांच बाहर से कराने को कहा जाता है। दवाइयां बाहर से लानी पड़ रही हैं। घर के कमाने वाले सदस्य अस्पताल में आकाश मौर्य खुद कमाते थे, बेटा अमित मजदूरी करता है और छोटा बेटा नल फिटिंग का काम करता है। घर में कुल 10 सदस्य हैं। अमित बताते हैं, "पिछले सात दिनों से हम तीनों कमाने वाले सदस्य अस्पताल में हैं। घर का चूल्हा कैसे जल रहा है, हम ही जानते हैं। कमाई का कोई जरिया नहीं बचा। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि हमें अपने बच्चों को घर से दूर भेजना पड़ा। मेरी छोटी बेटी को भी दस्त लगे थे। डर के मारे हमने दोनों बच्चों को उनकी नानी के घर भेज दिया, ताकि वे इस माहौल और बीमारी से बच सकें।" 'पार्षद ने कहा- मेरे पास मत आओ' जब अस्पताल में कोई सुनवाई नहीं हुई और आर्थिक बोझ बढ़ता गया, तो परिवार ने मदद के लिए स्थानीय पार्षद कमल वाघेला से गुहार लगाई। लेकिन वहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। अमित के अनुसार, "पार्षद जी ने साफ कह दिया कि इलाज चल रहा है, तो वहीं जाओ। मेरे पास क्यों आ रहे हो? अब आप ही बताइए, जब हमारा चुना हुआ प्रतिनिधि ही मुंह फेर ले, तो हम अपनी पीड़ा लेकर कहां जाएं?" अस्पताल में भी परिवार को कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही है। अमित कहते हैं, "डॉक्टर आते हैं, कुछ पर्ची पर लिख देते हैं और चले जाते हैं। हम पूछते हैं कि रिपोर्ट में क्या आया, तो कोई जवाब नहीं मिलता। बस इतना कहते हैं कि सरकारी अस्पताल है, जैसा इलाज होता है, वैसा ही होगा, बीच में दखल मत दो।