उत्तराखंड में हजारों वर्षों का इतिहास खतरे में:लखुडियार गुफा से मिट रही आदिमानवों की पेंटिंग्स, बाहरी हिस्से में बनेगी मजबूत दीवार

उत्तराखंड की ऐतिहासिक धरोहर 'लखुडियार' की प्राचीन रॉक पेंटिंग्स मिटने की कगार पर हैं। अल्मोड़ा में सुयाल नदी के तट पर स्थित इस प्रागैतिहासिक स्थल पर पर्यटकों द्वारा नाम लिखने और सुरक्षा कर्मियों की कमी के चलते हजारों साल पुराना इतिहास खतरे में आ गया है। अब इस धरोहर के संरक्षण के लिए मजबूत दीवार बनाई जाएगी। 'लखुडियार गुफा' हजारों सालों से आदिमानव के इतिहास को संजोए हुए है। एक लाख गुफाओं का यह समूह राज्य के सबसे महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक स्थलों में से एक है। यहां की चट्टानों पर पाषाण युग के इंसानों ने उंगलियों से जो चित्र उकेरे थे, वे आज भी उनके सामाजिक जीवन, शिकार के तरीकों और ज्यामितीय प्रतीकों की जानकारी देते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि जहां आधुनिक पेंट कुछ वर्षों में फीके पड़ जाते हैं, वहीं ये रॉक पेंटिंग्स हजारों सालों की धूप और बारिश झेलने के बाद भी आज तक दिखाई दे रही हैं। विरासत पर 'इंसानी लापरवाही' भारी प्राकृतिक नुकसान से ज्यादा इस धरोहर पर इंसानी गतिविधियों का असर पड़ रहा है। विडंबना देखिए, जिस इतिहास को देखने पर्यटक यहां आते हैं, वही इसे नष्ट कर रहे हैं। कई अराजक तत्व पत्थरों से दीवार पर निशान बना रहे हैं और अपना नाम लिख रहे हैं। पर्यटकों द्वारा बार-बार शैलचित्रों को छूने से उनके रंग और बनावट खराब हो रही है। पहले यहां सुरक्षा के लिए एक पीआरडी जवान तैनात था, लेकिन उसे हटाए जाने के बाद से यह स्थल असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है। पुरातत्व विभाग ने तीन बार भेजी डीपीआर क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी चंद्र सिंह चौहान ने बताया कि लखुडियार एक राज्य संरक्षित स्मारक है, लेकिन कर्मचारियों की भारी कमी के कारण 24 घंटे निगरानी करना असंभव है। उन्होंने आगे कहा - हमने रॉक पेंटिंग्स के केमिकल ट्रीटमेंट और संरक्षण के लिए कार्यदायी संस्था के माध्यम से अब तक तीन बार डीपीआर तैयार कर शासन को भेजी है। स्वीकृति मिलते ही पेंटिंग्स का वैज्ञानिक उपचार किया जाएगा और बाहरी हिस्से में रिटेनिंग वॉल बनाई जाएगी ताकि अनावश्यक आवाजाही रोकी जा सके। नहीं जागे तो खो देंगे अपनी पहचान इतिहासकारों और स्थानीय निवासियों का मानना है कि लखुडियार केवल एक गुफा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की ऐतिहासिक पहचान है। यदि शासन और प्रशासन ने तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए, तो वो दिन दूर नहीं जब ये अनमोल शैलचित्र केवल किताबों और पुरानी तस्वीरों तक सीमित रह जाएंगे। यह न केवल सरकार की बल्कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम अपनी इस प्राचीन धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें। अब लखुडियार में बने चित्रों के बारे में जानिए... लखुडियार के चित्रों में मानव आकृतियां सबसे प्रमुख हैं। यहां मनुष्यों को अक्सर 'स्टिक-लाइक' (छड़ी जैसी पतली आकृतियों) के रूप में दर्शाया गया है। इनके अलावा पशु और ज्यामितीय पैटर्न बने हुए हैं। इन शैलचित्रों में सबसे प्रसिद्ध दृश्य हाथ पकड़कर नृत्य करती हुई मानव आकृतियां हैं। एक दृश्य में 34 और दूसरे में 28 लोगों को एक साथ समूह में नृत्य करते हुए दिखाया गया है। एक खास दृश्य में आठ मानव आकृतियां हैं, जिनमें पहली आकृति सबसे बड़ी (20 सेमी) है और अंतिम सबसे छोटी (10 सेमी)। इन आकृतियों के सिर पर पीछे की ओर बालों का ऊंचा जूड़ा भी दिखाई देता है, जिससे इनके स्त्री होने का अनुमान लगाया जाता है। कुछ चित्रों में शिकार की मुद्रा में मानव चित्रों में लंबी थूथन वाला जानवर, लोमड़ी और कई पैरों वाली छिपकली के चित्र प्रमुख हैं। इसके अलावा हिरण और बैल जैसी आकृतियां भी देखी जा सकती हैं। कुछ चित्रों में मानव को दौड़ते हुए या शिकार की मुद्रा में दिखाया गया है, जो उस समय के जीवन संघर्ष को दर्शाते हैं।