मकर संक्रांति पर घुघुते की माला पहनेंगे बच्चे:गाना गाकर कोवो को बुलाएंगे; आज से ही मांगलिक कार्यों की होगी शुरुआत

उत्तराखंड में मकर संक्रांति के साथ ही कुमाऊं की धरती पर लोकसंस्कृति का अनूठा पर्व घुघुतिया (उत्तरायणी) पूरे उल्लास के साथ मनाया जाएगा। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है, जिसे ऋतु परिवर्तन, नई फसल और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इसी खगोलीय बदलाव की खुशी में कुमाऊं अंचल में यह पारंपरिक पर्व पीढ़ियों से मनाया जा रहा है। घुघुतिया केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि बच्चों, पक्षियों, प्रकृति और पूर्वजों से जुड़ा लोकउत्सव है। गांवों से लेकर शहरों तक घरों में घुघुतिया माला तैयार हो चुकी हैं और सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही कौवों को बुलाने की परंपरा निभाई जाएगी। ज्योतिर्लिंग जागेश्वर धाम के मुख्य पुजारी महामंडलेश्वर कैलाशानंद महाराज के अनुसार घुघुतिया पर्व कृतज्ञता, सहअस्तित्व और लोकसंस्कारों का संदेश देता है, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गया है। आज के दिन से ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत भी की जाती है। घुघुतिया की पहचान- मीठे पकवान और माला घुघुतिया पर्व की सबसे बड़ी पहचान “घुघुत” नामक पारंपरिक मीठा पकवान है। इसे गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनाया जाता है। घुघुत को पक्षी, सूर्य, चंद्रमा, मछली, धनुष, ढोल, फूल और शिव के डमरू जैसी पारंपरिक आकृतियों में ढाला जाता है। इन सभी घुघुतों को धागे में पिरोकर बच्चों के लिए सुंदर माला बनाई जाती है, जिसे घुघुतिया माला कहा जाता है। संतरा और माल्टा जैसे शीतकालीन फल भी इस माला में पिरोए जाते हैं, जिससे यह माला खेल, उपहार और स्नेह का प्रतीक बन जाती है। सुबह की परंपरा- कौवे को बुलाने का लोकगीत मकर संक्रांति की सुबह बच्चे स्नान के बाद घुघुतिया माला पहनकर छतों और आंगनों में जाते हैं। वे समूह में कौवों को बुलाते हुए पारंपरिक लोकगीत गाते हैं- ले कौवा फूलों, मकै दे भल-भल दुल्हल ले कौवा ढाल, मकै दे सुनक तलवार मकै दे भल-भल परिवार ले कौवा नारंगी, मकै दे भल-भल सारंगी इसके बाद कौवों को घुघुत अर्पित किए जाते हैं। कई घरों में यह मान्यता है कि जब तक कौवा घुघुत न खा ले, तब तक परिवार का कोई सदस्य इसे ग्रहण नहीं करता। इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। कौवे से जुड़ी लोकमान्यता और कथा महामंडलेश्वर कैलाशानंद महाराज के अनुसार कुमाऊं की एक प्राचीन लोककथा में एक राजा के छोटे राजकुमार को मंत्री ने षड्यंत्र के तहत जंगल में मरवाने की योजना बनाई थी। कौवों के शोर से गांव वालों को समय रहते इसकी जानकारी मिल गई और राजकुमार की जान बच गई। इसी कृतज्ञता के रूप में कौवों को घुघुत खिलाने की परंपरा शुरू हुई, जो आगे चलकर घुघुतिया पर्व के रूप में स्थापित हो गई। एक अन्य मान्यता के अनुसार कौवा पितरों का प्रतीक माना जाता है। उन्हें भोजन अर्पित करना पूर्वजों के सम्मान और उनके आशीर्वाद से जुड़ा हुआ है। इसी कारण घुघुतिया पर्व को केवल बच्चों का नहीं, बल्कि श्रद्धा और संस्कारों का पर्व माना जाता है। अल्मोड़ा में घुघुतिया की खास पहचान अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में घुघुतिया पर्व विशेष नियम और अनुशासन के साथ मनाया जाता है। यहां एक दिन पहले से ही घरों में तैयारियां शुरू हो जाती हैं। महिलाएं घुघुत बनाती हैं और सुबह बच्चों को माला पहनाई जाती है। यहां मान्यता है कि सबसे पहले घुघुत कौवों को अर्पित करना अनिवार्य है। इसके बाद बुजुर्ग बच्चों को आशीर्वाद देते हैं कि जैसे कौवा घुघुत खाए, वैसे ही जीवन में सुख-समृद्धि आए। कहां-कहां मनाया जाता है घुघुतिया घुघुतिया पर्व मुख्य रूप से कुमाऊं मंडल में मनाया जाता है। अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत, नैनीताल, रानीखेत, द्वाराहाट, सोमेश्वर, कपकोट, डीडीहाट और बेरीनाग जैसे क्षेत्रों में यह पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। गढ़वाल मंडल में यही पर्व मकर संक्रांति या खिचड़ी पर्व के रूप में जाना जाता है। लोकसंस्कृति की जीवित धरोहर महामंडलेश्वर कैलाशानंद महाराज के अनुसार घुघुतिया पर्व मनुष्य को प्रकृति, पक्षियों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ रहने की प्रेरणा देता है। यह पर्व सहअस्तित्व, प्रेम और सामाजिक मेलजोल का संदेश देता है। घुघुतिया या उत्तरायणी पर्व आज भी उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, आस्था और परंपरा को जीवंत बनाए रखने वाला अनुपम लोकपर्व है, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बना हुआ है।