श्रीकृष्ण की जय बोलकर चीनियों पर टूट पड़े थे सैनिक:तीन महीने बाद भी फायरिंग की पोजीशन में मोर्चे पर मिले थे बहादुर जवानों के शव

भारतीय सैन्य इतिहास में रेजांगला की लड़ाई सबसे चर्चित लड़ाइयों में से एक है। इस लड़ाई में भारतीय सेना के 124 फौजियों ने 1300 से अधिक चीनी सैनिकों का आखिरी सांस तक मुकाबला किया। इस लड़ाई में चार्ली कंपनी को जोधपुर जिले के बानासर के रहने वाले मेजर शैतान सिंह लीड कर रहे थे। इसमें शामिल ज्यादातर सैनिक राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश (UP) के थे। इस लड़ाई में 123 सैनिक शहीद हुए थे। कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी को लद्दाख क्षेत्र की चुशुल एयर स्ट्रिप की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया था। करीब 2 किलोमीटर लंबी पहाड़ी पर इस कंपनी ने मोर्चा संभाला था। यह इलाका 5000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर है। यहां तापमान माइनस में रहता है। इतनी हाइट और ठंड पर कई अफसर और जवान बीमार हो गए थे। इसके बाद उनकी जगह मेजर शैतान सिंह को भेजा गया था। भास्कर की 'आर्मी की कहानी' सीरीज में आज पढ़िए द बैटल ऑफ रेजांगला... एक इशारे पर जान कुर्बान करने को तैयार थे​​ जवान​​​​​ कुमाऊं रेजिमेंट की जिस चार्ली कंपनी को मेजर शैतान सिंह कमांड कर रहे थे, इसमें ज्यादातर जवान अहीरवाल (यादव समाज) थे। सभी जवान मेजर शैतान सिंह से घुले-मिले हुए थे। मेजर ने इस मोर्चे पर जवानों के साथ पारिवारिक रिश्ता बना लिया था। वे अपने कमांडिंग ऑफिसर के एक इशारे पर देश के लिए जान कुर्बान करने को तैयार थे। हम भगवान कृष्ण के वंशज हैं, पीछे नहीं हटेंगे रेजांगला पर चीनी आक्रमण की तैयारियों के बारे में कमांड हेडक्वार्टर को पहले से पता चल गया था। एडवांस पेट्रोल पार्टियों ने सीमा पर चीनी उकसावे और भारी जमावड़े को पहले ही भांप लिया था। कंपनी हेडक्वार्टर से चार्ली कंपनी को यह विकल्प दिया गया था कि वे चौकी छोड़ दें, क्योंकि तर्क दिया गया कि उस वक्त तक मुकाबले के लिए पर्याप्त संसाधन और फोर्स नहीं थी। मेजर शैतान सिंह ने जवानों में पहले से ही जोश भर रखा था। उन्होंने सभी तैयारियां कर रखी थीं। मोर्टार लगा रखे थे। जवानों ने मेजर से कहा- हम भगवान कृष्ण के वंशज हैं। कृष्ण भगवान हमारे साथ हैं। हम मोर्चा नहीं छोड़ेंगे और चीनियों को सबक सिखाएंगे। मेजर शैतान सिंह ने जवानों से कहा- मैं भी भगवान कृष्ण का वंशज हूं। इसके बाद सब मोर्चाबंदी, मोर्टार और गोला बारूद को संभालकर तैयारियों में जुट गए। आज भी सुनाए जाते हैं वीरता के किस्से रेजांगला की लड़ाई में चार्ली कंपनी को कमांड करने वाले मेजर शैतान सिंह का जन्म 1 दिसंबर 1924 को जोधपुर के बानासर में हुआ था। उनके पिता, लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह भी एक सम्मानित आर्मी अफसर थे। मेजर शैतान सिंह को 1 अगस्त 1949 को कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन मिला। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, कुमाऊं रेजिमेंट चुशूल सेक्टर में तैनात थी। रेजांगला में मेजर शैतान सिंह की चार्ली कंपनी 5000 मीटर की ऊंचाई पर तैनात थी और उनके पास पांच प्लाटून थीं। 18 नवंबर को रेजांगला पर हमला किया रक्षा मंत्रालय की तरफ से परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह के साइटेशन (किसी लेख, शोध या काम में इस्तेमाल की गई जानकारी) में लिखा है- 18 नवंबर को अलसुबह चीनी फौज ने रेजांगला पर हमला किया। हाड़ कंपा देने वाली ठंड और बर्फीली हवा चल रही थी। वहां पर 7 और 8 नंबर प्लाटून मोर्चे पर थी। सुबह 5:00 बजे अंधेरा छंटने लगा तो चीनी फौजी भारतीय सीमा में आगे बढ़ते दिखे। चार्ली कंपनी के जवानों ने राइफलों, लाइट मशीन गनों, ग्रेनेड और मोर्टार से हमला बोल दिया। इस कार्रवाई में पूरा नाला चीनी सैनिकों की लाशों से भर गया था। सुबह 5:40 फिर से चीनी सैनिकों ने हमला किया थोड़ी देर बाद 350 के आसपास चीनी सैनिकों ने नाले की दूसरी तरफ से हमला बोला। यह लगभग सुबह 5:40 के आसपास का वक्त था। भारतीय जवान यहां चीनी सैनिकों के 90 मीटर की रेंज में आने का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही रेंज में चीनी सैनिक आए, चार्ली कंपनी के सैनिकों ने मोर्टार और मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी। इस बार फिर नाले पर चीनी सैनिकों की लाशें बिछा दीं। 2 बार हमला विफल होने के बाद चीनी पक्ष ने पैंतरा बदला। 400 चीनी सैनिकों ने कंपनी की पोजिशन के पीछे से अटैक किया। यानी 2 तरफ से हमला किया। इस बार उन्होंने प्लाटून नंबर 8 पर मीडियम मशीन गनों और भारी तोपखाने से हमला किया। प्लाटून नंबर 7 की पोजिशन पर भी पीछे से हमला किया। चीनी सैनिक काफी आगे तक पहुंच गए। भीषण लड़ाई चलती रही। बंकर से बाहर आकर कुछ चीनियों को हाथों से मारा एक मौका ऐसा भी आया जब हमारे जवानों ने बंकर से बाहर आकर कुछ चीनियों को हाथों से मारा, गुत्थमगुत्था होता रहा, लेकिन सामने से गोलाबारी में शहीद हो गए। कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह ने इस गोलाबारी के बीच भारी साहस का परिचय दिया। गोलाबारी के बीच वे एक प्लाटून से दूसरी प्लाटून जाकर जवानों का हौसला बढ़ाते रहे, रणनीति समझाते रहे। चीनी गोलाबारी में मेजर शैतान सिंह की आंतें बाहर आ गई थीं गोलाबारी के बीच अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना, मेजर शैतान सिंह एक से दूसरी प्लाटून में जाकर जवानों को दिशा-निर्देश देते रहे। वे अपने सिपाहियों के साथ लगातार लड़े। जब मेजर शैतान सिंह एक प्लाटून से दूसरी की तरफ जा रहे थे, तो पहले उनकी बांह पर गोली लग गई। इसके बाद भी वे नहीं रुके। कुछ देर बाद मेजर के पेट में एक बड़ी गोली लगी और इस बार सेल इतना घातक था कि उनकी आंतें बाहर आ गईं। मेजर को लग गया था कि अब वे नहीं बचेंगे। उन्होंने अपने साथ के दो सैनिकों से कहा कि आप जाइए। जब उन्होंने कहा कि हम आपको इस हालत में छोड़कर नहीं जा सकते, तो मेजर ने कहा कि यह मेरा आदेश है। उस वक्त मेजर शैतान सिंह के साथ रहे सेना के रेडियो ऑपरेटर रामचंद्र ने विस्तार से इस घटना के बारे में कई बार जिक्र किया है। मेजर शैतान सिंह ने रामचंद्र से कहा- उनका बेल्ट खोल दें। रामचंद्र ने जब बेल्ट खोलने के लिए हाथ अंदर डाला तो देखा कि मेजर का पेट पूरा खुल गया था और उनकी आंतें बाहर आ गई थीं। रामचंद्र ने इस पर बेल्ट खोलने में असमर्थता जताई। मेजर ने कहा कि उन्हें चट्टान के सहारे लिटा दें और आप कंपनी हेडक्वार्टर जाकर पूरी सूचना दें कि हमारे जवान बहुत बहादुरी से लड़े हैं। कुछ देर बाद मेजर शैतान सिंह बेहोश हो गए। उन्होंने अंतिम सांस वहीं ली। अपने कमांडिंग ऑफिसर के आदेश के मुताबिक जवान वहां से चले गए। रेजांगला की लड़ाई में कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के 123 सिपाही शहीद हुए। चीन की तरफ हमसे ज्यादा लोग मारे गए थे। जब युद्ध खत्म हुआ तो मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर वहीं पर मिला था। बॉडीगार्ड को चीनी सैनिकों ने युद्धबंदी बनाया चार्ली कंपनी में रेजांगला की लड़ाई के वक्त हरियाणा के रहने वाले निहाल सिंह मेजर शैतान सिंह के बॉडीगार्ड थे। निहाल सिंह को चीनी सैनिकों ने पकड़ लिया था। निहाल सिंह से कमांडिंग अफसरों, सेना के पदनाम, अहम यूनिटों की तैनाती और सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर के बारे में पूछताछ की गई, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं बताया। निहाल सिंह को युद्धबंदी बनाकर चीनी कैंप में रखा गया था। एक दिन निहाल सिंह को भागने का मौका मिल गया। निहाल सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए मीडिया को बताया- चीनी सैनिकों का ध्यान बातें करने पर था, मैं मौका मिलते ही भाग गया। जब तक चीनी सैनिकों को पता लगा तब तक लगभग 500 मीटर चल चुका था और काफी आगे निकल गया था। उस वक्त अंधेरा था। निहाल सिंह अंधेरे में छिपकर भागने का रास्ता तलाश रहे थे, उन्हें रास्ते की जानकारी नहीं थी। वे उधेड़बुन में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे, तभी उन्हें एक कमजोर सा कुत्ता दिखा। उसे आवाज देते ही वह तत्काल पहचान गया और पास आ गया। यह वही कुत्ता था जो सेना चौकी पर आया करता था। फौजी जवान उसे खाना दिया करते थे। निहाल सिंह कुत्ते के साथ-साथ चलने लगे। यह भारतीय सीमा की तरफ जा रहा था। उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर चलने में दिक्कत हो रही थी। जरा भी गलती होती तो चीनी सैनिक पकड़ सकते थे। काफी देर चलने के बाद वे भारतीय सीमा में आर्मी कैंप तक पहुंचे। आर्मी कैंप में हर जवान को अलग से पासकोड दिया जाता था। उनके पास पासकोड नहीं था। इसके बिना रात में उन्हें गोली मारी जा सकती थी। इसलिए सुबह तक इंतजार किया। सुबह आर्मी कैंप पहुंचकर उन्होंने पूरा वृतांत बताया। उन्हें इलाज के लिए हॉस्पिटल में रखा गया। कई महीनों तक वो भर्ती रहे थे। तीन महीने बाद लड़ाई वाली जगह पहुंचे थे अफसर रेजांगला की लड़ाई के बाद एक बार यह मान लिया गया था कि चार्ली बटालियन को या तो चीनियों ने पकड़ लिया है या वे भाग गए हैं। जवान रामचंद्र की बातों पर अफसरों ने शुरू में यकीन ही नहीं किया था। बाद में जब युद्ध खत्म हुआ और आर्मी हेडक्वार्टर तक बात पहुंची तो वरिष्ठ अफसरों को रेजांगला भेजा गया। रेजांगला की लड़ाई के बारे में रिटायर्ड नेवी अफसर और लेखक कुलप्रीत यादव ने लिखा है। यादव ने लिखा है कि जब ब्रिगेडियर टीएन रैना और भारतीय खोज दल 10 फरवरी, 1963 को रेजांगला पहुंचा। उन्होंने युद्ध क्षेत्र को जमा हुआ पाया। सैनिक अभी भी फायरिंग पोजिशन में थे। उनके हाथों में राइफलें थीं। उनके शरीर पत्थरों और अस्थायी बंकरों के पीछे दुबके हुए थे। गुरप्रीत यादव लिखते हैं कि युद्ध के 3 महीने बाद इन 120 बहादुर सैनिकों और उनके कंपनी कमांडर के शव मिले। सब जवानों के सीने पर गोली लगी हुई थी। किसी के भी पीठ पर गोली नहीं थी। जवानों की इस बहादुरी को देख ब्रिगेडियर रैना भावुक हो गए थे। कुलप्रीत यादव की किताब 'द बैटल ऑफ रेजांगला' में मेजर जनरल विक्रम देव डोगरा लिखते हैं- ब्रिगेडियर टीएन रैना ने रेजांगला पर कहा था कि सैन्य इतिहास में ऐसे बहुत कम बहादुरी के उदाहरण देखने को मिलते हैं, जब सिपाही आखिरी बुलेट और आखिरी व्यक्ति और आखिरी सांस तक लड़ता हो। रेजांगला की लड़ाई भारतीय सैन्य इतिहास में एक चमकता उदाहरण है। जबकि इन सैनिकों के सामने पहाड़ सी चुनौतियां थीं। उनके पास संसाधन भी पूरे नहीं थे। थ्री नॉट थ्री राइफलें थीं, जो चीनी हथियारों के सामने कहीं नहीं टिकती थीं। जवानों के पास माइनस तापमान में पहनने योग्य गर्म कपड़े तक ढंग के नहीं होते थे। ------- आर्मी डे सीरीज की ये खबरें भी पढ़िए... राजस्थान के लेफ्टिनेंट-जनरल, जो पंडित नेहरू से भिड़ गए थे:पूछा था- आपके पास प्रधानमंत्री पद का कितना अनुभव?; गांधी पर उठाए थे सवाल देश के बंटवारे के समय राजस्थान में जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह सेना में थे। वे अपने बेबाक अंदाज और निडरता के कारण काफी चर्चित रहे थे। सेना के अफसरों के अनुभव पर सवाल उठाने पर उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से ही पूछ लिया था- आपके पास प्रधानमंत्री पद पर रहने का कितना अनुभव है? पढ़ें पूरी खबर राजस्थानी फौजी ने पाकिस्तान का भूगोल बदला:80 किलोमीटर अंदर जाकर कब्जा किया; बैंक का पैसा और सोना जब्त किया जयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को दो मोर्चों पर हराकर उसका भूगोल बदल दिया था। (पढ़िए पूरी खबर)