विश्व प्रसिद्ध ॐ पर्वत धीरे-धीरे पड़ रहा काला:हिमालय की चोटियों से बर्फ गायब, पर्यावरणविद् बोले- ऊंचे इलाकों में मानवीय हस्तक्षेप कम करना जरूरी

उत्तराखंड में बारिश और बर्फबारी की कमी के कारण हिमालय काला पड़ता जा रहा है। पिथौरागढ़ जिले में स्थित पंचाचूली, हंसलिंग और विश्व प्रसिद्ध ॐ पर्वत सर्दियां में बर्फ की मोटी परत हुआ करती थी, अब नाममात्र की बर्फ के साथ खड़े हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि हिमालय के बदलते मौसम का भी संकेत है। जनवरी का आधा महीना बीत चुका है, लेकिन अभी तक बर्फबारी नहीं हुई है। दिन में धूप की तपिश के कारण बची हुई बर्फ भी पिघल रही है, जिससे हिमालय की पर्वत श्रृंखला काली नजर आ रही है। पिथौरागढ़ जिले के गुंजी में जहां इस समय कम से कम दो फीट बर्फ होनी चाहिए थी, वहां धूल उड़ रही है। स्थानीय लोग मौसम की इस बेरुखी से अचंभित हैं, क्योंकि उन्होंने पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी थी। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश और बर्फबारी नहीं होने का कारण पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टरबेंस) का निष्क्रिय होना है। पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के बाद ही बारिश और बर्फबारी के आसार हैं। हालांकि, कुछ दिन यही स्थिति रहने की संभावना है। हिमालय में बर्फबारी की कमी न केवल पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि यह स्थानीय लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। ॐ पर्वत पर भी कम बर्फ ओम पर्वत कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर स्थित है। ओम पर्वत हिंदुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। कैलाश मानसरोवर, आदि कैलाश आने वाले श्रद्धालु ओम पर्वत को जरूर देखते हैं। ओम पर्वत की ऊंचाई 5900 मीटर है। ओम पर्वत को कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर 3987 मीटर (लगभग 13,080 फीट) की ऊंचाई पर स्थित नाभिढांग से देखा जा सकता है। इस समय इस पर्वत पर चार फीट से अधिक बर्फ होनी चाहिए थी, लेकिन इस चोटी पर नाममात्र की ही बर्फ है। अक्टूबर में हुई थी हल्की बर्फबारी पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में अक्टूबर में हल्का हिमपात हुआ था। तब उम्मीद थी कि इस शीतकाल में मौसम अच्छा रहेगा, लेकिन अक्टूबर के बाद जनवरी पहले सप्ताह में ही हल्की बर्फबारी के बाद मौसम रूठ गया। जो बर्फ गिर भी रही है, वह धूप की तपिश से पिघल जा रही है। नवंबर से शुरू हो जाता था हिमपात गुंजी निवासी तेज सिंह ने बताया कि पांच-छह साल पहले तक नवंबर महीने से बर्फबारी शुरू हो जाती थी। बर्फबारी के कारण फंसने के डर से माइग्रेशन वाले परिवार अक्तूबर के अंतिम सप्ताह तक घाटी की ओर लौट आते थे। इस समय गुंजी में कम से कम दो फीट बर्फ होनी चाहिए थी, लेकिन वहां पर धूल उड़ रही है। अंतिम गांव कुटी में भी बर्फ नहीं है। यही स्थिति धारचूला के दारमा घाटी के गांवों में भी बनी है। पिछले एक से दो दशकों में मौसम में बड़ा बदलाव आया है। वेस्टर्न डिस्टरबेंस है कारण केवीके पिथौरागढ़ के मौसम विशेषज्ञ डॉ. चेतन भट्‌ट का कहना है कि बारिश या बर्फबारी नहीं होने का कारण वेस्टर्न डिस्टरबेंस है। पक्षिमी विक्षोभ के निष्क्रिय होने से बारिश नहीं हो रही है। इसके सक्रिय होने के बाद ही बारिश और बर्फबारी के आसार हैं। कुछ दिन यही स्थिति रहने की संभावना है। उच्च हिमालय में मानव हस्तक्षेप पर्यावरणविद् पद्मश्री बसंती दीदी ने बताया कि वनों को मनमाने तरीके से काट दिया गया। अंधाधुंध तरीके से विकास कार्य हो रहे हैं। पद्मश्री बसंती दीदी ने बताया- उच्च हिमालयी क्षेत्र तक हजारों लोगों की आवाजाही बढ़ी है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से इस तरह के बदलाव आ रहे हैं। पर्यावरण संतुलन के लिए वनों और उच्च हिमालय में मानव हस्तक्षेप को कम करना होगा।