द डिडिटल न्यूद पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने गुरुवार को नई दिल्ली में DNPA कॉन्क्लेव 2026 का आयोजन किया। कॉन्क्लेव में दैनिक भास्कर कॉर्प के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (MeitY) के सचिव एस कृष्णन से डिजिटल मीडिया कंटेंट को लेकर बातचीत की। इसमें इनोवेशंस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रेग्यूलेशन, सस्टेनेबल ग्रोथ किस तरह से भारत की न्यूज इंडस्ट्री के भविष्य को आकार देंगे, इस पर चर्चा हुई। विषय था ‘एक मजबूत डिजिटल भविष्य के लिए नई रणनीति तैयार करना”। बातचीत के संपादित अंश: डीपीआईटी इस समय सभी तरह के कंटेंट डील कर रही है, जिनमें न्यूज, म्यूजिक, फिल्म शामिल हैं। क्या हमें सेक्टर स्पेसफिक एआई गाइडलाइंस की उम्मीद करनी चाहिए? जवाब: अभी इस बारे में कुछ नहीं कह सकते। हमने अभी जो डेटा वर्क किया है, उसमें जनरल फ्रेमवर्क होगा। हां, इसके भीतर सेक्टर व्यू भी देख सकते हैं। जहां तक न्यूज क्रिएटर्स की चिंता है, वह एक लेवल पर यह एक जैसा है। जैसे कि कॉपीराइट। अगर आप लॉन्गटर्म में देख रहे हैं जैसे कि कोई नाॉवेल, पेंटिंग, आर्टवर्क तो वह थोड़ा अलग हो सकता है। जो आज न्यूज है, वह एक साल बाद रिलेवेंट नहीं होगी, लेकिन आर्काइव में रहकर 50 साल बाद इम्पॉर्टेंट हो सकती है। इसलिए कछ मामलों में कॉपीराइट इश्यू सबसे अहम रह सकता है। कुछ मामलों में डीपर सोसाइटल रोल्स अहम हो सकता है। इसलिए हमें स्पेसिफिक रोल रखना होगा। ऐतिहासिक और कानूनी रूप से हम ऐसा अप्रोच रखते रहे हैं। लेकिन यह कॉपीराइट से एकदम अलग भी नहीं होगा। क्या इस मामले में क्लैरिटी लाने के लिए सरकार और पब्लिशर मिलकर काम कर सकते हैं। अगर हां तो कैसे? जवाब: मेरी मिनिस्ट्री कोई भी कानून बनाने से पहले संबंधित लोगों से बात करती है। यह हमारी जरूरत भी है। जहां तक आपका सवाल है तो यह तीन-चार मिनिस्ट्री से जुड़ा है, लेकिन सरकार के तौर हम हर मसले पर नजर रखते हैं। हमें अपनी सरकार के स्ट्रक्चर को देखकर काम करना होता है, जैसे कि अगर टेक्नोलॉजी चेंज हो रही है या दुनिया में कुछ बड़ा बदलाव हो रहा है। ऐसा होने पर हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे लिए कौन से बदलाव जरूरी हैं, जिन्हें अपनाया जाना चाहिए। क्या इसके लिए कोई नोडल एजेंसी होगी क्योंकि यह बेहद संवेदनशीन मामला है और इनका तेजी से समाधान चाहिए होगा? जवाब: मैं अपनी मिनिस्ट्री के अलावा किसी और के बारे में बात नहीं कर सकता हूं। मैं यह नहीं कह सकता हूं कि हर चीज सेंट्रलाइज्ड होनी चाहिए। तो क्या मैं जान सकता हूं कि यह आपकी विशलिस्ट में है या नहीं? जवाब: देखिए। यदि कुछ किया जाना है तो उसका एक प्रोसेस है। आखिर सरकार में पोर्टफोलियो सिस्टम क्यों है। यह सिस्टम ही इसलिए है कि अलग-अलग लोगों के हितों या सवालों को समझा जा सके और उसे सुलझाया जा सके। अगर कहीं समस्या आती है तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम मिलकर इसे कैसे सुलझाते हैं। मैं अभी यह नहीं कह सकता कि यह इश्यू मेरा नहीं है, किसी और का है। इसकी बजाय मैं यह कहूंगा कि मुझे इसके लिए दूसरी मिनिस्ट्री से बात करनी होगी। इसके बाद हम मिलकर कोई समाधान तय करेंगे। इसलिए मुझे लगता है कि आपको नोडल एजेंसी को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए कि कोई इश्यू होने पर किससे संपर्क करना है। इसके लिए एक की बजाय दो या तीन पॉइंट्स हो सकते हैं। हां, अगर हमें लगेगा कि किसी मामले में अर्जेंसी है तो हम हस्तक्षेप कर इसे जल्दी सुलझा लेंगे। हम दुनियाभर में सोशल मीडिया कंटेंट पर स्क्रूटनी देख रहे हैं। ऐसे में भारत फ्री एक्सप्रेशन और प्लेटफॉर्म अकाउंटेबिलिटी के बीच कैसे संतुलन बनाएगा? जवाब: राइट टू स्पीच 1902 ऑफ कॉन्सिट्यूशन में बोलने की आजादी की बात है। कंटेंट उसके तहत होना चाहिए। 69 ए में प्रतिबंध हैं जैसे पब्लिक ऑर्डर डिफेंस आदि हैं। दूसरे सेक्शन में डिफेमेटरी और ऑब्लिगेटरी कंटेंट हैं ये आईटी एक्ट के सेक्शन 79 में आते हैं। आपको भारत मे काम करना है तो यहां का कानून पालन करना होगा। हम इसी तरह के मुद्दों से डील करते हैं। इस पर सवाल हो सकता है। सरकार डिजिटल न्यूज से क्या उम्मीद करती है? जवाब: सबसे जरूरी है कि मीडिया चाहता है कि उसे लोग सीरियली लें तो उसे क्या हो रहा है यह बताना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो इस पर आपको विचार करना चाहिए। सबसे जरूरी बात है कि मीडिया को लोग सीरियली लेना चाहें तो यह सवाल आपको खुद से करने की जरूरत है। एक प्रशानिक अधिकारी और सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि आप कानून का पालन करें। हम यही चाहते हैं। आप क्रेडिबल हैं या नहीं यह लोगों को तय करने लीजिए। (इस पर पवनजी ने कहा यहां सभी सहमत हैं कि लोग हम पर भरोसा करते हैं। यही हमारे अस्तित्व की वजह है।) डीपर गवर्नमेंट एंड इंडस्ट्री कोलैबरेशन को लेकर आप क्या कहना चाहेंगे? जवाब: अपार्चुनिटी यह है कि तकनीक अवेलेबल है। इसका उपयोग करें। मीडिया यह कर सकता है। यह बैलेंस वे में होना चाहिए। यह सोसायटी से जुड़ा मामला है। छात्रों से लेकर बुजुर्ग तक सभी इनफॉर्म्ड रहना चाहते हैं और एजुकेट रहना चाहते हैं। आप नहीं चाहेंगे कि इस पर प्रतिबंध हो। इस एआई एरा में लेगेसी और भरोसेमंद पब्लिशर्स को रिलेवेंट बने रहने के लिए स्ट्रेटजिक शिफ्ट क्या होनी चाहिए? जवाब: मेरे जैसा व्यक्ति जो हर दिन न्यूज पेपर पढ़ता है हर दिन अपडेट रहना चाहता है। उसे आप अपडेट करते रहिए। पहले एक डेडलाइन होती थी। अब ऐसा नहीं है। अब आपको हर वक्त कंटेंट अपडेट करना होगा। पत्रकारों के लिए यह कठिन है लेकिन आप हर दिन जिस तरह से अपडेट करते हैं इसकी क्रेडिबलिटी है।