इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण से संवेदनशील फैसला सुनाया है, जो भविष्य में रेल दुर्घटनाओं से जुड़े मुआवजा मामलों में मिसाल बन सकता है। इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी रेल दुर्घटना में गर्भवती महिला की मृत्यु होती है और उसके साथ गर्भ में पल रहे 5 महीने या उससे अधिक आयु के भ्रूण की भी मृत्यु हो जाती है, तो रेलवे को दोनों के लिए अलग-अलग मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने भ्रूण को केवल एक जैविक अवस्था नहीं, बल्कि एक “व्यक्ति” के रूप में मान्यता दी है, जो जन्म लेने वाला था और जिसकी मृत्यु एक स्वतंत्र दुर्घटना मानी जाएगी।