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मात्र 85 पन्नों वाला यह उपन्यास अपनी सरल भाषा, सहज कथानक और वास्तविक जीवन के अनुभवों से इस तरह पगा है कि आप कई दिनों तक इस कहानी को अपने हिसाब से समझने की कोशिश करते रहेंगे. उपन्यास के संवाद इतने स्वाभाविक हैं कि जैसे लगता है कि मानव मनोविज्ञान का सजीव चित्रण किया गया है.
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