Sudarshan News
अमेरिका और ईरान के बीच काफी लंबे समय से चल रहे तनाव को समाप्त करने के लिए दोनों देश शांति समझौते के करीब पहुंचते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी मीडिया के अनुसार , अमेरिका और ईरान 21 अप्रैल को खत्म हो रहे सीजफायर से पहले समझौते के करीब पहुंच रहे हैं , दोनों पक्षों के बीच बातचीत आगे बढ़ी है , हालांकि कुछ मतभेद अभी भी बाकी हैं। ईरानी अधिकारियों और पाकिस्तानी सेना के बीच अहम बैठक आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस बीच गुरुवार को तेहरान में ईरानी अधिकारियों और पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के बीच अहम बैठक होगी। मुनीर पहले ही ईरान पहुंचकर विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात कर चुके हैं और वे अमेरिकी संदेश लेकर गए हैं। वहीं पाकिस्तान , मिस्र और तुर्की मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। उधर , अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस , स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर के साथ मिलकर बातचीत और ड्राफ्ट प्रस्ताव साझा कर रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक , डील के लिए सीजफायर को बढ़ाया जा सकता है , हालांकि अमेरिका ने अभी औपचारिक सहमति नहीं दी है। दोनों देशों के बीच बातचीत में प्रगति हुई है , लेकिन कई अहम मुद्दों पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान , मिस्र और तुर्की मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और लगातार संपर्क में हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस , स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ईरान और मध्यस्थ देशों के साथ लगातार बातचीत करते हुए नजर आ रहे हैं। इस दौरान ड्राफ्ट प्रस्तावों का आदान-प्रदान भी जारी है। सूत्रों के अनुसार , सीजफायर समाप्त होने से पहले एक और आमने-सामने बैठक संभव है। यदि फ्रेमवर्क समझौता बनता है तो सीजफायर को आगे बढ़ाया जा सकता है , हालांकि अमेरिका की ओर से अभी तक औपचारिक सहमति नहीं दी गई है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट में ट्रम्प की नौसैनिक नाकेबंदी और आर्थिक दबाव के कारण ईरान पर समझौते का दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका ने दावा किया है कि नाकेबंदी के बाद पिछले 48 घंटों में कोई भी जहाज ईरानी बंदरगाहों तक नहीं पहुंचा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ( CENTCOM) के मुताबिक , इस दौरान 9 जहाजों को लौटा दिया गया। ईरान रोजाना करीब 15 लाख बैरल तेल निर्यात करता है। इससे उसे लगभग 140 मिलियन डॉलर की आय होती है , लेकिन नाकेबंदी से इस कमाई पर असर पड़ सकता है। ईरान के खार्ग द्वीप से लगभग 90% तेल निर्यात होता है , जो नाकेबंदी के चलते प्रभावित हो सकता है। अगर ईरान तेल निर्यात नहीं कर पाया , तो उसे उत्पादन रोकना पड़ सकता है , जिससे आर्थिक नुकसान होगा। युद्ध से पहले भी ईरान की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों के कारण दबाव में थी , लेकिन अब हालात और बिगड़ गए हैं।
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