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दिल्ली में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर संस्कृत भारती के नए केंद्रीय कार्यालय “प्रणव” का लोकार्पण किया गया। यह कार्यक्रम वैदिक परंपराओं के साथ सम्पन्न हुआ और इसे संस्कृत भाषा के पुनर्जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, दर्शन और जीवन मूल्यों का आधार है। उन्होंने इसे “भारत का प्राण” बताते हुए कहा कि देश को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी है और इसमें ज्ञान-विज्ञान का विशाल भंडार मौजूद है, जो पूरी मानवता के लिए उपयोगी है। डॉ. मोहन भागवत जी ने संस्कृत सीखने के लिए संभाषण (बोलचाल) पद्धति को सबसे प्रभावी तरीका बताया। उन्होंने कहा कि अभ्यास और निरंतरता के माध्यम से संस्कृत को आसानी से सीखा जा सकता है। संस्कृत संभाषण शिविरों को उन्होंने इस दिशा में उपयोगी पहल बताया। लोकार्पण से पहले गाय पूजा और शतचंडी यज्ञ जैसे वैदिक अनुष्ठान किए गए। इसके बाद भवन का औपचारिक उद्घाटन किया गया और डॉ. भागवत ने परिसर का निरीक्षण भी किया। कार्यक्रम में संस्कृत भारती के कई पदाधिकारी और विद्वान उपस्थित रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में कहा कि “प्रणव” कार्यालय का उद्घाटन भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाली सशक्त भाषा है। संस्कृत भारती के संगठन मंत्री ने बताया कि संगठन की शुरुआत 1981 में हुई थी और अब यह भारत के कई जिलों के साथ-साथ विदेशों तक पहुंच चुका है। इसका उद्देश्य संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाना है। उन्होंने बताया कि संस्था का लक्ष्य देश की बड़ी आबादी तक संस्कृत पहुंचाना और विभिन्न भाषाओं के माध्यम से शिक्षण कार्य को आगे बढ़ाना है। नया भवन लगभग 50,000 वर्ग फुट क्षेत्र में फैला हुआ है और इसे आधुनिक सुविधाओं तथा पारंपरिक ज्ञान का संगम बताया गया है। यहां विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराया जाएगा।
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