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मेरठ सेंट्रल मार्केट: 1989 की गलती, पिछली सरकारों की गलतियों के चलते अब कानून का हथौड़ा | Collector
मेरठ सेंट्रल मार्केट: 1989 की गलती, पिछली सरकारों की गलतियों के चलते अब कानून का हथौड़ा
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मेरठ सेंट्रल मार्केट: 1989 की गलती, पिछली सरकारों की गलतियों के चलते अब कानून का हथौड़ा

इनपुट- रजत के. मिश्र, लखनऊ, twitter- rajatkmishra1 मेरठ का सेंट्रल मार्केट विवाद दरअसल आज का नहीं बल्कि दशकों पुरानी लापरवाही का नतीजा है। 1989 में जिस निर्माण की नींव संदिग्ध हालात में रखी गई, उसे रोकने, सुधारने या वैध बनाने की जिम्मेदारी बाद की सरकारों पर थी। लेकिन सालों तक फाइलें दबती रहीं, नियम टूटते रहे और सिस्टम खामोश रहा। सबसे बड़े सवाल 2013 से 2017 के दौर पर उठते हैं जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारों के दौरान अवैध निर्माण पर कार्रवाई नहीं हुई। राजनैतिक संरक्षण में नियमों को दरकिनार किया गया और प्रशासन ने आंखें मूंदकर इस “टाइम बम” को बढ़ने दिया। सालों तक सरकारी संरक्षण में कानून को ताक पर रखकर काम होता रहा। आज वही राजनीतिक दल इस मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं, जिनके दौर में यह संकट खड़ा हुआ। कोर्ट ने दिखाई सख्ती - जब मामला सुप्रीम अदालत में पहुंचा तो कोर्ट ने भावनाओं नहीं कानून को प्राथमिकता दी। राजनीतिक हमलों के बीच योगी आदित्यनाथ को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश हुई, लेकिन ज़मीनी तथ्य अलग कहानी बताते हैं। सूत्र बताते है कि योगी सरकार ने प्रभावितों को तीन स्पष्ट विकल्प दिए और आखिरी वक्त तक राहत का रास्ता निकालने की कोशिश की। विकल्प भी सीधे थे, पहला कि पीड़ित पक्ष सरकार के साथ मिलकर कानूनी लड़ाई लड़े दूसरा निर्माण में बदलाव कर वैधता का रास्ता अपनाया जाये और पीड़ित पक्ष के पुनर्वास की व्यवस्था यूपी सरकार करेगी लेकिन इन विकल्पों पर सहमति नहीं बन सकी। अब असली जिम्मेदार कौन - आज जब ध्वस्तीकरण की नौबत आई है, तो सीधा सवाल उठता है 1989 में नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? 2013–2017 के बीच संरक्षण देने वालों की जवाबदेही तय होगी या नहीं या फिर सारा बोझ सिर्फ दुकानदारों और आम लोगों पर ही डाला जाएगा। इस पूरे केस में कुछ याचिकाओं और “खुराना” जैसे नामों को लेकर यह आरोप भी सामने आए कि PIL का इस्तेमाल निजी हितों के लिए किया गया। हालांकि यह राजनीतिक आरोप हैं लेकिन इन्होंने विवाद को और भड़काया जरूर है। मेरठ का सेंट्रल मार्केट केस साफ संकेत देता है कि यूपी की पिछली सरकारों की गलती और संरक्षण का ख़ामियाजा मेरठ के व्यापारी भुगत रहे है। आज जिस सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं वही अदालत में प्रभावितों के लिए राहत की लड़ाई भी लड़ रही है। अब फैसला सिर्फ इमारत का नहीं बल्कि सियासी सच्चाई का भी होना बाकी है।

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