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भारत में बुद्ध केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि दलित चेतना और सामाजिक प्रतिवाद के सबसे बड़े प्रतीक भी हैं. डॉ. अंबेडकर के प्रभाव से शुरू हुई यह वैचारिक क्रांति आज करोड़ों लोगों के लिए आत्म-सम्मान, तर्क और जाति-मुक्त पहचान का आधार बन चुकी है. मान्यता है कि ये हिंदू रूढ़िवाद के सामने एक सशक्त विकल्प पेश करती है.
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