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अतिथियों का परिचय विद्यालय के प्रधानाचार्य *श्री राम निवास सिंह* द्वारा कराया गया। *‘संस्कारयुक्त, भारत-केंद्रित शिक्षा’ पर जोर* समापन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि आचरण निर्माण करना है। वंदना, भोजन मंत्र, व्यवहार और विचार-विमर्श के माध्यम से 15 दिन में आचार्यों के मन, चित्त और वाणी में परिवर्तन लाने का प्रयास किया गया। ____________________________________________ उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है। यदि शिक्षा समाज के अनुकूल होगी तो राष्ट्र समृद्ध और शक्तिशाली बनेगा। उन्होंने आचार्यों से आह्वान किया कि वे नई पीढ़ी को ‘श्रेष्ठ, समर्थ और संपन्न भारत’ बनाने के संकल्प के साथ कार्य करें। ______________________________________________ डॉ. मालवीय ने कहा कि भारत सिर्फ एक भू-भाग नहीं, बल्कि आनंद, ज्ञान, मुक्ति और परोपकार का प्रतीक है। भारत की संस्कृति ‘संबंध’ और ‘कर्तव्य’ पर आधारित है। राम, लक्ष्मण और सीता के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि मर्यादा और धर्मयुक्त संबंध ही भारत की पहचान हैं। ___________________________________________________ उन्होंने चेताया कि आज पूंजीवाद, समाजवाद और सांस्कृतिक अतिवाद जैसे विचार भारतीय मूल्यों को खंडित करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में विद्या भारती के आचार्यों की जिम्मेदारी है कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा, ऋषियों के विचार और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के मंत्र को समाज तक पहुंचाएं। ___________________________________________________ डॉ. मालवीय ने बताया कि विद्या भारती अगले वर्ष गुरु पूर्णिमा से अपना 75वां ‘अमृत महोत्सव वर्ष’ मनाने जा रही है। उन्होंने कहा कि अभी विद्या भारती की उपस्थिति 24 हजार केंद्रों तक है, लेकिन जब यह 24 लाख या 24 करोड़ तक पहुंचेगी, तभी भारत में वास्तविक भारत-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था स्थापित हो सकेगी। कार्यक्रम के इस अवसर पर प्रदेश निरीक्षक अवध प्रांत रामजी सिंह , पूर्णकालिक अधिकारी बंधु एवं संभाग निरीक्षक आदि उपस्थित रहे। ___________________________________________________ कार्यक्रम के अंत में विद्यालय के अध्यक्ष *श्री सुभाष चन्द्र अग्निहोत्री* ने सभी अतिथियों, प्रशिक्षक आचार्यों एवं कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। समापन सत्र में 15 दिन के प्रशिक्षण में सम्मिलित नवचयनित आचार्यों ने शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने का संकल्प लिया।
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