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वह 14 मार्च की शनिवार वाली सुबह थी, जब गाजियाबाद के उस घर का वह कमरा हमेशा के लिए खाली होने जा रहा था. 13 साल से जिस बिस्तर पर हरीश एक 'जिंदा लाश' बनकर लेटा था, आज उस बिस्तर की जरूरत खत्म हो गई थी. घर से 33 किलोमीटर दूर एम्स तक का वह सफर किसी इलाज के लिए नहीं, बल्कि हमेशा-हमेशा के लिए धड़कनों को खामोश करने के लिए था. 24 मार्च की शाम जब चिता की आग की लपटें आसमान की ओर उठीं, तो वह सिर्फ एक शरीर का अंत नहीं था, बल्कि भारत के कानूनी इतिहास में 'इज्जत की मौत' की पहली मुकम्मल दास्तां थी.
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